आजकल बड़े-बड़े निजी स्कूलों में बच्चों की भरमार है। हर अभिभावक अपने बच्चे का दाखिला नामी स्कूल में कराना चाहता है, लेकिन ऊंची फीस और अलग-अलग मदों में वसूले जा रहे शुल्क के कारण कई अभिभावक बीच में ही कदम पीछे खींच लेते हैं। एडमिशन फीस, वार्षिक शुल्क, स्मार्ट क्लास शुल्क, एक्टिविटी शुल्क, डेवलपमेंट शुल्क जैसे कई नामों से फीस ली जा रही है।
फीस के अलावा अलग-अलग मदों में वसूली
अभिभावकों का आरोप है कि ट्यूशन फीस के अलावा स्कूलों में यूनिफॉर्म, किताबें, कॉपी, आईडी कार्ड, ट्रांसपोर्ट, डिजिटल क्लास, परीक्षा शुल्क आदि के नाम पर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है। इससे शिक्षा का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए बच्चों की पढ़ाई मुश्किल होती जा रही है।
कोर्स पर 50 से 70 प्रतिशत तक कमीशन
सूत्रों के अनुसार कई स्कूल बाहरी कोर्स, एक्टिविटी प्रोग्राम या अतिरिक्त शैक्षणिक पैकेज पर 50 से 70 प्रतिशत तक कमीशन ले रहे हैं। अभिभावकों को यह कोर्स अनिवार्य या जरूरी बताकर लेने के लिए प्रेरित किया जाता है।
2000 बच्चों पर करोड़ों का खेल
यदि किसी बड़े स्कूल में 2000 बच्चों को मान लिया जाए और एक कोर्स की औसत कीमत 3500 रुपये मानी जाए (जबकि कई कोर्स 6000 रुपये तक के बताए जा रहे हैं), तो कुल राशि इस प्रकार बनती है:
बच्चों की संख्या: 2000
प्रति बच्चा औसत कोर्स: ₹3500
कुल कोर्स राशि: 2000 × 3500 = ₹70,00,000
60 प्रतिशत कमीशन का गणित
यदि इस पर 60 प्रतिशत कमीशन स्कूल को दिया जाए तो:
स्कूल का कमीशन (60%) = ₹42,00,000
कोर्स संचालित करने वाली संस्था के पास (40%) = ₹28,00,000
अभिभावकों में बढ़ रही नाराजगी
अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा पहले ही महंगी है, ऊपर से इस तरह के कोर्स अनिवार्य करने से आर्थिक बोझ और बढ़ रहा है। कई अभिभावक पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं और चाहते हैं कि ऐसे कोर्स पूरी तरह वैकल्पिक हों।
जांच की मांग
शिक्षा से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि इस तरह का कमीशन सिस्टम चल रहा है तो इसकी जांच होनी चाहिए। अभिभावकों से ली जाने वाली राशि और स्कूलों को मिलने वाले कमीशन की पारदर्शिता जरूरी है, ताकि शिक्षा व्यवसाय न बनकर सेवा बनी रहे।


