बुलन्द संदेश ब्यूरो
कांठ, मुरादाबाद (सुदेश बिश्नोई) । जनपद एवं प्रदेश के जूनियर हाई स्कूलों में कार्यरत 25 हजार अनुदेशकों के वेतन बढ़ोतरी मुद्दे पर यूपी सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने 4 फरवरी के अपने फैसले की समीक्षा करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने महज 7 हजार रुपये मासिक मानदेय पर कार्यरत अनुदेशकों का मानदेय बढ़ा दिया था। साथ ही यह भी कहा था कि अनुबंध खत्म होने के बाद उनकी नियुक्ति स्थायी मानी जाएगी।जस्टिस विक्रम नाथ और पी.बी. बराले की पीठ ने इस फैसले की समीक्षा की मांग को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। पीठ ने एक पन्ने के अपने आदेश में कहा कि 4 फरवरी, 2026 को पारित फैसले में किसी तरह की कोई खामी नहीं है। उक्त फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एक दशक से भी अधिक समय से इन अनुबंधित अनुदेशकों को महज 7 हजार रुपये मासिक मानदेय पर रखना एक अनुचित प्रथा है जो बंधुआ मजदूरी/बेगार के समान है। यह संविधान के अनुच्छेद 23 पूरी तरह से प्रतिबंधित है।
सरकार ने दलील दी थी कि केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजना के लिए केंद्र से पैसा नहीं मिलने के बाद राज्य सरकार को पूरा मानदेय देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। इसे कोर्ट ने ठुकरा दिया था। कहा था कि ये अनुदेशक जो लगातार दस साल से अधिक समय से काम कर रहे हैं, उन्हें स्थायी रूप से नियुक्त माना जाएगा। समय के साथ और काम की निरंतरता को ध्यान में रखते हुए ऐसे पद अपने आप बन जाते हैं। पीठ ने यूपी सरकार को आदेश दिया है कि वह 1 अप्रैल, 2026 से इस श्रेणी के
अनुदेशकों को 17,000 रुपये प्रति माह दर से मानदेय देना था l सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ के जिला अध्यक्ष डॉक्टर नीरज शर्मा, जिला उपाध्यक्ष एवं ब्लॉक छजलैट के अध्यक्ष डॉ कपिल सिरोही ने स्वागत किया हैl


