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उत्तर प्रदेश

*गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः*

*गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः*

बुलन्द संदेश ब्यूरो

 

*गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर, मैं उन सभी गुरुओं को श्रद्धा से नमन करती हूँ जिनसे मैंने कुछ भी सीखा, जिन्होंने मेरे जीवन को दिशा दी, और मेरे अंतर्मन को आलोकित किया*

 

 

गाज़ियाबाद (आशा चौधरी) गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास की शुक्ल पूर्णिमा को मनाई जाती है। यह दिन आध्यात्मिक और शैक्षणिक गुरुओं के प्रति सम्मान, श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए समर्पित है। हिंदू धर्म में इसे 'व्यास पूर्णिमा' भी कहते हैं, क्योंकि इस दिन महान ऋषि वेद व्यास का जन्म हुआ था।

क्यों मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा?

महर्षि वेद व्यास जयंती: सनातन धर्म में वेदों का विभाजन करने और महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना करने वाले महर्षि वेद व्यास को आदिगुरु माना जाता है। उनके जन्मदिवस को ही गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।बौद्ध धर्म में महत्व: बौद्ध धर्म के अनुयायियों के अनुसार, इस दिन भगवान बुद्ध ने सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया था।

जैन धर्म: जैन परंपरा में इस दिन को भगवान महावीर द्वारा अपने पहले शिष्य गौतम स्वामी बनाने की स्मृति के रूप में भी मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा पर क्या करें?

गुरु पूजन: इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और अपने गुरुओं की पूजा करें। यदि आपके गुरु साक्षात मौजूद हैं, तो उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।आध्यात्मिक साधना: यदि आपके गुरु भौतिक रूप से साथ नहीं हैं, तो आप उनका ध्यान और स्मरण कर सकते हैं। इस दिन ध्यान और साधना करने का विशेष महत्व है lदान-पुण्य: जरूरतमंदों को दान करना, संतों की सेवा करना और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना इस दिन बहुत शुभ माना जाता है। सनातन धर्म में गुरु पूर्णिमा का महत्व*

 गुरु पूर्णिमा सनातन धर्म के सबसे पवित्र पर्वों में से एक है, जो गुरु-शिष्य परंपरा को समर्पित है। सनातन धर्म में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूजनीय माना गया है, क्योंकि वही अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं।यह दिन महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में मनाया जाता है, जिन्होंने चारों वेदों का संकलन, महाभारत, 18 पुराण और ब्रह्मसूत्र की रचना की।वेद, उपनिषद, योग, आयुर्वेद, भारतीय दर्शन और संस्कृति गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से हजारों वर्षों से सुरक्षित और जीवित हैं।

सनातन धर्म सिखाता है कि धन से बड़ा ज्ञान है, और ज्ञान से बड़ा गुरु। गुरु केवल शिक्षा नहीं देते, बल्कि चरित्र, संस्कार, अनुशासन और धर्म का निर्माण करते हैं। भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का आधार गुरु-शिष्य परंपरा है। गुरु पूर्णिमा हमें अपने गुरु, माता-पिता, आचार्य और जीवन में मार्गदर्शन देने वाले सभी व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की प्रेरणा देती है। "गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः; गुरु साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः।". सबसे पहले गुरु – माता क्योंकि जन्म के बाद बच्चा सबसे पहले अपनी माता से बोलना, चलना, संस्कार और जीवन के प्रारंभिक पाठ सीखता है। 2. दूसरे गुरु – पिता

पिता जीवन के व्यवहार, अनुशासन, जिम्मेदारी और कर्म का ज्ञान देते हैं।

 3. तीसरे गुरु – आचार्य (शिक्षक)

जो विद्या, शास्त्र और कौशल सिखाते हैं।

 4. परम गुरु – सद्गुरु

जो आत्मज्ञान, ईश्वर का मार्ग और मोक्ष का ज्ञान कराते हैं। सनातन धर्म में सद्गुरु का स्थान अत्यंत उच्च माना गया है।जब तक गुरु-शिष्य परंपरा जीवित है, तब तक सनातन धर्म की ज्ञान परंपरा और भारत की सांस्कृतिक आत्मा भी जीवित रहेगी।