बुलन्द संदेश /ब्यूरो
*"सैनिक कभी अकेला नहीं होता; देश आज भी उनके साथ खड़ा है"*
गाज़ियाबाद (आशा चौधरी) भारत की पहचान केवल उसकी प्राचीन संस्कृति, लोकतंत्र या आर्थिक विकास से ही नहीं, बल्कि उन करोड़ों नागरिकों की भावना से भी होती है जो अपने सैनिकों को देश का गौरव मानते हैं। हालाँकि समय-समय पर दुखद घटनाएँ होती रहती हैं, लेकिन उन्हें समाज या पूरी व्यवस्था की ओर से सैनिकों के प्रति सम्मान की कमी का सबूत मानना गलत होगा।भारत का इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी देश पर कोई संकट आया, उसके बहादुर बेटों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। यह परंपरा केवल आधुनिक भारतीय सेना तक ही सीमित नहीं है; यह स्वतंत्रता संग्राम के दिनों से लेकर आज तक बिना रुके चली आ रही है। इसलिए, यह कहना कि देश अपने सैनिकों को भूल गया है, भारत की सामूहिक भावना और इतिहास की सही तस्वीर पेश नहीं करता है।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने बुलंद आवाज़ में कहा था: "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।" इस आह्वान पर प्रतिक्रिया देते हुए, भारत भर के विभिन्न क्षेत्रों, भाषाओं और समुदायों के लोग आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल हुए और इस मकसद के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया। उनका एकमात्र उद्देश्य था भारत की आज़ादी। उन्होंने साबित कर दिया कि जब देश की बात आती है, तो भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है।
आज़ाद भारत की सेना इसी परंपरा की उत्तराधिकारी है। सीमाओं पर तैनात सैनिक जाति, भाषा, धर्म या क्षेत्र के आधार पर नहीं, बल्कि तिरंगे के प्रति अपनी शपथ का पालन करते हुए देश की रक्षा करते हैं। एकता, अनुशासन और देशभक्ति भारतीय सेना की पहचान हैं।हर क्षेत्र और समुदाय के सैनिकों—जिनमें सिख, गोरखा, गढ़वाली, राजपूत, जाट, डोगरा, मराठा, कुमाऊँनी, मद्रासी और असम राइफल्स शामिल हैं—ने भारत की रक्षा में बेमिसाल वीरता का प्रदर्शन किया है। गोरखा सैनिकों की बहादुरी दुनिया भर में मशहूर है, जबकि गढ़वाल और कुमाऊँ के सैनिकों ने हिमालय की दुर्गम चोटियों के बीच देश की रक्षा में अमिट योगदान दिया है। सिख रेजिमेंट ने भी कई युद्धों में असाधारण साहस का परिचय दिया है। यह भारत की साझा राष्ट्रीय विरासत है। इतिहास हमें यह भी बताता है कि करोड़ों भारतीयों ने आज़ादी की लड़ाई और देश की रक्षा के लिए बलिदान दिए हैं। भले ही अलग-अलग समय पर कुछ लोगों द्वारा देशद्रोह या दुश्मन का साथ देने के मामले सामने आए हों, लेकिन यह कहना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा कि किसी पूरे समुदाय ने "कभी देशद्रोह नहीं किया" या "हमेशा ऐसा ही किया।" अलग-अलग धर्मों, जातियों और क्षेत्रों के लोगों ने भारत की आज़ादी और सुरक्षा में अहम योगदान दिया है। इसलिए, देशभक्ति को किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं किया जा सकता। आज भी, भारत सरकार सैनिकों और पूर्व सैनिकों के कल्याण के लिए कई योजनाएँ चलाती है। जहाँ भी कोई समस्या या कमी हो, उसे दूर करना सरकार और समाज, दोनों की ज़िम्मेदारी है। फिर भी, यह बात उतनी ही सच है कि देश अपने सैनिकों के सम्मान को सबसे ऊपर रखता है और उनके बलिदानों को कभी नहीं भूल सकता।भारत का भविष्य तभी सुरक्षित रहेगा जब सैनिकों, सरकार और समाज के बीच भरोसे और सम्मान का रिश्ता और मज़बूत होगा। यही एक विकसित भारत की पहचान है—एक ऐसा देश जहाँ सैनिक न केवल सीमाओं पर, बल्कि अपने ही देश के भीतर भी सम्मान, सुरक्षा और गर्व महसूस करते हैं। राष्ट्र सर्वोपरि, सैनिक उसका गौरव और तिरंगा हम सबकी पहचान। यही भारत की ताकत और भारत का भविष्य है।


