cbamazon
उत्तर प्रदेश

संघर्ष, साहस और सफलता की प्रेरणादायक महिला की कहानी!

संघर्ष, साहस और सफलता की प्रेरणादायक महिला की कहानी!

बुलन्द संदेश ब्यूरो

 गवाॅं (सम्भल) गवाॅं नगर क्षेत्र के ग्राम हरदासपुर निवासी रश्मी पत्नी अजय भारती कठिन समय में भी हिम्मत नहीं हारी…मेरी प्रिय पत्नी रश्मी उस समय आठ माह की गर्भवती थीं। यह समय हर महिला के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से अत्यंत कठिन होता है। इसी बीच 11 मई 2026 से बी.एड. द्वितीय वर्ष की परीक्षाएँ शुरू हो गईं। हमारा परीक्षा केंद्र मुरादाबाद था, जो हमारे घर से लगभग 80 किलोमीटर दूर था। अंतिम परीक्षा 25 मई 2026 को थी।15 और 16 मई को उनकी तबीयत काफी खराब हो गई, लेकिन दवा लेकर उन्होंने समय पर हर परीक्षा दी। उन्होंने दर्द, थकान और कठिन परिस्थितियों को अपने हौसले के आगे कभी जीतने नहीं दिया। समय बीतता गया और प्रसव की तिथि नज़दीक आ गई। 21 जून 2026 को अचानक प्रसव की समस्या शुरू हुई। सामान्य प्रसव का प्रयास गवां और अनूपशहर में दो दिनों तक किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिली। इस कठिन समय में हमारे चचेरे भाई डॉ. सुमित ने हर संभव सहयोग किया, जिसके लिए हम सदैव उनके आभारी रहेंगे।जब स्थिति गंभीर होने लगी, तब हम यशदान हॉस्पिटल, हसनपुर पहुँचे। हमारे साथ परिवार के सदस्य—माँ, बहन, बहनोई, ताई, मौसी तथा ससुराल पक्ष से सास, मौसेरी सास, साले, सलेज एवं अन्य परिजन भी मौजूद थे।23 जून 2026, सुबह 7:51 बजे यशदान हॉस्पिटल, हसनपुर में सी-सेक्शन (ऑपरेशन) के माध्यम से हमारे घर एक पुत्र रत्न का जन्म हुआ। वह पल हमारे जीवन की सबसे बड़ी खुशियों में से एक था।अस्पताल का बिल काफी अधिक था, जिसे कम कराने में मेरे बहनोई धर्मेंद्र, साले अजय कुमार और राजकुमार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन दिनों मेरी स्थिति ऐसी थी कि कब सुबह होती और कब शाम, इसका भी पता नहीं चलता था। अस्पताल की भागदौड़, परिवार की जिम्मेदारियाँ और मानसिक तनाव लगातार बना हुआ था।लेकिन संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ था।अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान कॉलेज से आदरणीय ओमवीर सर का फोन आया। उन्होंने बताया कि बी.एड. का प्रैक्टिकल है और उपस्थित होना अनिवार्य है। हमने अपनी पूरी परिस्थिति बताई, लेकिन बाहरी परीक्षक (महिला) ने किसी भी प्रकार की छूट देने से स्पष्ट मना कर दिया।जब मैंने यह बात पत्नी से कही, तो उन्होंने अद्भुत साहस दिखाते हुए कहा—

"मुझे कॉलेज ले चलो, मैं अपना प्रैक्टिकल दूँगी।" डॉक्टरों ने पहले अनुमति नहीं दी, लेकिन काफी अनुरोध और सिफारिश के बाद अनुमति मिल गई। तुरंत एम्बुलेंस बुलाई गई और हम नवजात शिशु के साथ यशदान हॉस्पिटल, हसनपुर से मुरादाबाद के लिए रवाना हुए। हमारे साथ साले सुखवीर की पत्नी रिंकी तथा दूसरे साले रोहित के पुत्र मोहन भी थे।रास्ते में एम्बुलेंस चालक ने पूछा, "आपको कहाँ छोड़ना है?" जब उसे पता चला कि अस्पताल से सीधे कॉलेज परीक्षा देने जा रहे हैं, तो उसने आश्चर्य से कहा— 

"मैंने अपनी ज़िंदगी में पहली बार ऐसा मामला देखा है कि कोई मरीज एम्बुलेंस से सीधे कॉलेज परीक्षा देने जा रहा है।" कॉलेज पहुँचने पर चौकीदार ने एम्बुलेंस को अंदर जाने से रोक दिया। जैसे ही सायरन बजा, पूरा कॉलेज स्टाफ बाहर आ गया। सभी ने एम्बुलेंस में बैठी रश्मी से बातचीत की, उनकी स्थिति देखी, फोटो भी खींचे और आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा—

"ऐसी घटना हमने पहली बार देखी है। अब आप निश्चिंत होकर अपना प्रैक्टिकल दीजिए। "रश्मी ने साहस और आत्मविश्वास के साथ अपना प्रैक्टिकल सफलतापूर्वक पूरा किया। इसके बाद हम वापस अस्पताल लौट आए। दो दिन बाद अस्पताल से छुट्टी मिली और हम अपने घर आ गए।घर आने के बाद उपचार, दवाइयों और इंजेक्शनों की व्यवस्था में डॉ. अवनेश का भी अमूल्य योगदान रहा, जिसके लिए हम उनका हृदय से आभार व्यक्त करते हैं।और फिर आया वह दिन, जिसका पूरे परिवार को बेसब्री से इंतज़ार था। 19 जुलाई 2026 को बी.एड. द्वितीय वर्ष का अंतिम परिणाम घोषित हुआ। मेरी पत्नी रश्मी ने 65% अंकों के साथ प्रथम श्रेणी (First Division) में परीक्षा उत्तीर्ण की।यह सफलता केवल अंकों की नहीं, बल्कि साहस, धैर्य, संघर्ष, त्याग और आत्मविश्वास की जीत है। आज परिवार, रिश्तेदार और सभी शुभचिंतक उनकी सराहना कर रहे हैं कि इतनी कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने हार नहीं मानी।

 रश्मी,आपके अदम्य साहस, अटूट धैर्य और दृढ़ संकल्प को मेरा शत-शत नमन।

आपको इस शानदार सफलता पर हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य के लिए अनंत मंगलकामनाएँ।

???? आप सचमुच हर महिला के लिए एक प्रेरणा हैं। ????