बुलन्द संदेश /ब्यूरो
2011 में नियुक्ति के समय से आज तक लखनऊ में ही जमा है एक चिकित्सा अधीक्षक
लखनऊ (लेखराम मौर्य)। उत्तर प्रदेश की राजधानी में ही स्वास्थ्य विभाग अपने ही विभाग के शासनादेश का खुला उल्लंघन कर रहा है क्योंकि पिछले वर्षों में जारी शासनादेशों को छोड़ दिया जाए तो इस वर्ष के शासनादेश के अनुसार कोई भी चिकित्सा अधिकारी अथवा चिकित्सा अधीक्षक अपने जिले में 3 साल तक ही सेवा दे सकता है और मंडल
में 5 वर्ष की सेवा के बाद उसका स्थानांतरण हो जाना चाहिए परंतु राजधानी में एक ऐसा चिकित्सा अधिकारी तैनात है

जिसकी नियुक्ति 15 जनवरी 2011 को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मॉल में चिकित्सा अधिकारी के रूप में की गई थी जिसका नाम है डॉक्टर जेपी सिंह। 12 -5- 2017 तक 6 साल 3 महीना 27 दिन माल में चिकित्सा अधिकारी के रूप में सेवा देने के बाद इनका स्थानांतरण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मोहनलालगंज कर दिया गया जहां से इन्होंने अपना स्थानांतरण मात्र 15 महीने में ही सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बख्शी का तालाब करवा लिया। इस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में चिकित्सा अधिकारी के रूप में इनकी नियुक्ति 7 अगस्त 2018 को की गई उसके बाद 5 सितंबर 2020 तक यह यहां चिकित्सा अधिकारी के रूप में कार्यरत थे उसके बाद इसी स्वास्थ्य केंद्र में एक दिन बाद ही 7 सितंबर 2020 को चिकित्सा अधीक्षक के रूप में तैनाती दे दी गई जहां 5 साल 10 महीने से एक ही पद पर जमे हुए हैं इस बीच इनको अतिरिक्त चार्ज के रूप में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र इटौंजा का चार्ज 7 जुलाई 2023 को दे दिया गया जहां यह 30 अक्टूबर 2024 तक अतिरिक्त चार्ज देखते रहे। इसके ठीक एक महीने बाद 30 नवंबर 2024 को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र माल का अतिरिक्त चार्ज दे दिया गया जहां यह आज भी अतिरिक्त चार्ज के रूप में कार्यरत हैं। इटौंजा में 1 साल 3 महीने 10 दिन अतिरिक्त चार्ज के रूप में तैनाती रही जबकि मॉल में 1 साल 7 महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी अतिरिक्त चार्ज के रूप में अस्पताल अस्पताल की अवस्थाओं को सुधारने में नाकाम रहने के बावजूद मुख्य चिकित्सा अधिकारी लखनऊ सहित मंडल और निदेशालय तक के अधिकारियों को राजधानी में होने के बावजूद यह सब दिखाई नहीं पड़ रहा है क्योंकि राजधानी में सामुदायिक स्वास्थ्य केदो की संख्या सीमित होने के बावजूद यहां चिकित्सा अधीक्षकों की वर्षों तक नियुक्ति न होना स्वास्थ्य विभाग की कार्यशाली पर सवालिया निशान खड़ा होता है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मॉल में वर्षों से कमीशन खोरी के चलते अल्ट्रासाउंड नहीं हो रहे हैं जबकि जिले के अन्य सामुदायिक स्वास्थ्य केदो में अल्ट्रासाउंड मशीन चालू हैं इसके पहले पूर्व मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने भी इसे चालू करने का आश्वासन दिया था

परंतु उनके स्थानांतरण के बाद यहां के शुद्ध लेने वाला कोई नहीं बचा और बीच में हालात तो यहां तक खराब हो गए थे कि एक्स-रे की प्लेट तक नहीं रह गई थी और रिपोर्ट मोबाइल पर दी जा रही थी इसके अलावा पिछले रविवार को ही प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हसनापुर और सस्पन स्वास्थ्य मेले के दिन भी समय से कई घंटे पहले बंद हो गए थे जिससे पता चलता है कि यहां कुछ भी नियंत्रण में नहीं है या यह कहा जाए की यहां सब कुछ खाओ कमाओ और सबको खिलाओ की नीति के तहत चल रहा प्रतीत होता है इस पूर्व में भी इन्हीं के कार्यकाल में कई बार अस्पताल में अवैध वसूली के आरोप लगा चुके हैं बावजूद इसके मुख्य चिकित्सा अधिकारी से लेकर शासनादेश का अनुपालन करने वाले मंडल और महानिदेशालय के अधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारियां और नियमों को तक पर रखकर अस्पताल को जैसे निजी चिकित्सालय बनाने का संकल्प ले रखा हो क्योंकि बाहर से दवाई लिखना आम बात है यहां कई डॉक्टर पर वही नियम लागू किया जाता है जबकि कुछ फार्मासिस्ट बाहर की दवाएं लिखते रहते हैं जिनको उन मेडिकल स्टरों से मोटा कमीशन मिलता है उन पर कोई प्रतिबंध नहीं है इसी प्रकार हसनापुर में भी लगातार महंगी महंगी दवाई सामने खोले गए मेडिकल स्टोर से लिखी जाती हैं सूत्र बताते हैं कि उस मेडिकल स्टोर के संचालक का संबंध वहां तैनात रहे एक फार्मासिस्ट से है जिसकी वजह से हमेशा बाहर की दवाएं बुखार और खांसी तथा आई ड्रॉप तक मेडिकल स्टोर से लाने के लिए लिख दिए जाते हैं।
यहां यह बताना जरूरी है कि 19-5-2026 को अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष द्वारा जारी शासनादेश का अनुपालन अधिकारियों द्वारा क्यों नहीं किया गया और क्या कुछ चिकित्सा अधिकारियों पर यह शासनादेश लागू नहीं होता है क्या यह चिकित्सा अधीक्षक उत्तर प्रदेश की सीमा से बाहर तैनात है जो इस पर किसी भी शासनादेश के अनुसार कार्रवाई नहीं की जा रही है


